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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 406

Reading 417 of 516 · Source nos. 4712–4723 · Source PDF 423

1निष्काम भक्ति करो गोविंद राधे।

2योगक्षेम वहनकर्ता हरि को बना दे॥ 4712॥

3भक्तों का योगक्षेम गोविंद राधे।

4मैं ही वहन करुँ नित्य बता दे॥ 4713॥

5भक्त मेरी सेवा चह गोविंद राधे।

6मैं भी भक्त सेवा चहुँ सबको बता दे॥ 4714॥

7भक्त आये शरण में गोविंद राधे।

8मैं भक्त भक्ति करुँ सबको बता दे॥ 4715॥

9भक्त जहाँ जहाँ जाये गोविंद राधे।

10तहाँ तहाँ पाछे पाछे जाऊँ बता दे॥ 4716॥

11भक्त मेरे प्राण प्रिय गोविंद राधे।

12भक्तों के ऋण ते उऋण ना बता दे॥ 4717॥

13ब्रह्मा कह भक्तों को गोविंद राधे।

14क्या दोगे हरि टुक सोचि के बता दे॥ 4718॥

15आपने असुरों को गोविंद राधे।

16दे दिया अपने आप को बता दे॥ 4719॥

17हरि कह भक्तों ते गोविंद राधे।

18कभी भी उऋण नहिं होउँगा बता दे॥ 4720॥

19भक्तों में शिरोमणि गोविंद राधे।

20ब्रज गोपीजन ब्रज में बता दे॥ 4721॥

21श्यामा श्याम जोई भज गोविंद राधे।

22श्यामा श्याम भी भजें वाको बता दे॥ 4722॥

23श्यामा श्याम नाहीं भजे गोविंद राधे।

24ब्रजबामा भजे ऋणी मानें बता दे॥ 4723॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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