Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 390
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1श्रीकृष्ण मित्र थे गोविंद राधे।
2एक विप्र ब्रह्मज्ञानी बता दे॥ 4520॥
3वेदज्ञ शांतचित्त गोविंद राधे।
4अति ही विरक्त जित इन्द्रिय बता दे।। 4521॥
5गृहस्थ होकर भी गोविंद राधे।
6संग्रह परिग्रह रहित बता दे।। 4522॥
7प्रारब्ध अनुसार गोविंद राधे।
8जो भी मिल जाता खाते बता दे।। 4523॥
9फटे पुराने वस्त्र गोविंद राधे।
10जैसे वे वैसी पत्नी बता दे।। 4524॥
11एक दिन पत्नी ने गोविंद राधे।
12कहा सुदामा पति ते बता दे।। 4525॥
13सुना है तुम्हारे मित्र गोविंद राधे।
14श्रीकृष्ण लक्ष्मीपति हैं बता दे।। 4526॥
15वे कृष्ण विप्रभक्त गोविंद राधे।
16शरणागत वत्सल हैं बता दे।। 4527॥
17आप वहाँ जावो अरु गोविंद राधे।
18उनते धन धान्य लावो बता दे।। 4528॥
19वे कृष्ण द्वारिका में गोविंद राधे।
20रहते हैं वैभवयुक्त बता दे।। 4529॥
21अपने भक्तों को गोविंद राधे।
22अपने आपु को देते बता दे।। 4530॥
23ऐसे वे जगद्गुरु गोविंद राधे।
24कंगाल को भी मालामाल बना दे।। 4531॥