Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 389
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1पुनि पुनि यों मन गोविंद राधे।
2लगाते लगाते लग जायेगा बता दे॥ 4508॥
3कर सों माला फिरे गोविंद राधे।
4मन फिरे जग जप धोखा बता दे॥ 4509॥
5हरि ते तो जो भी कहो गोविंद राधे।
6रसना के साथ साथ मन भी लगा दे॥ 4510॥
7सोचना ही साधना है गोविंद राधे।
8बार बार सोचना ही हरि ते मिला दे॥ 4511॥
9मेरा तू मेरा तू गोविंद राधे।
10बार बार सोचना ही हरि ते मिला दे॥ 4512॥
11बार बार सोचो मन गोविंद राधे।
12गरबाँहीं दै के दोनों झलक दिखा दे॥ 4513॥
13लक्ष्य को न दूर मानो गोविंद राधे।
14लक्ष्य को निकट मानो लक्ष्य दिला दे॥ 4514॥
15रो रो के बुलाये जा गोविंद राधे।
16इक दिन आके मिलें अवशि बता दे॥ 4515॥
17काहे घबराये मन गोविंद राधे।
18पूतना को दीन्हीं गति तोहिं काहे ना दे॥ 4516॥
19हरि सा उदार नहिं गोविंद राधे।
20असुरन बधि निज लोक पठा दे॥ 4517॥
21हरि सा उदार नहिं गोविंद राधे।
22घोड़ा बनि गोपों को कंधे बिठा दे॥ 4518॥
23हरि सा उदार नहिं गोविंद राधे।
24मित्र सुदामा हित स्वर्ग बना दे॥ 4519॥