Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 391
Reading 402 of 516 · Source nos. 4532–4543 · Source PDF 408
1सोचा सुदामा ने गोविंद राधे।
2इसी बहाने दर्शन हो बता दे।। 4532॥
3कहा सुदामा ने गोविंद राधे।
4सखा हेतु कछु भेंट तो दो बता दे।। 4533॥
5पत्नी ने पड़ोसी ते गोविंद राधे।
6चार मूठि चिवड़े माँगि दीन्यो बता दे।। 4534॥
7चिवड़े सुदामा लै गोविंद राधे।
8पहुँचे द्वारिकाधाम बता दे।। 4535॥
9कृष्ण ने सुदामा के गोविंद राधे।
10धोये चरण दृग-अश्रु ते बता दे।। 4536॥
11दोनों ने बचपन की गोविंद राधे।
12लीलाओं का किया गान बता दे।। 4537॥
13कृष्ण छोरि एक मुट्ठी गोविंद राधे।
14खाया चिवड़ा बड़े चाव ते बता दे।। 4538॥
15रुक्मिणी लक्ष्मी ने गोविंद राधे।
16पकरा हाथ कहा बस बस बता दे।। 4539॥
17सुदामा घर लौटे गोविंद राधे।
18देखा यहाँ तो दिव्य स्वर्ग बता दे।। 4540॥
19भक्ति ही स्वार्थ भी है गोविंद राधे।
20भक्ति ही है परमार्थ भी बता दे॥ 4541॥
21चित्त सरल हो तो गोविंद राधे।
22भक्ति आविर्भाव शीघ्र हो बता दे॥ 4542॥
23भोला भाला व्यक्ति गोविंद राधे।
24भक्ति का लाभ शीघ्र पावे बता दे॥ 4543॥