Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 376
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1मन ते ही सोचो रूप गोविंद राधे।
2मन ते ही अष्टयामी सेवा करा दे॥ 4352॥
3मन में कामनायें गोविंद राधे।
4आने न पायें रहे ध्यान बता दे॥ 4353॥
5उपासना पास जाना गोविंद राधे।
6अग्नि पास जाय जैसे शीत भगा दे॥ 4354॥
7मन ते बनाओ रूप गोविंद राधे।
8मन ते ही करो सेवा अर्चना बता दे॥ 4355॥
9माधुर्य भाव में तो गोविंद राधे।
10मन ते तजे देह भौतिक बता दे॥ 4356॥
11मन ते बनावे देह गोविंद राधे।
12दिव्य किशोरी सुन्दरी ज्यों बता दे॥ 4357॥
13रूपध्यान ही है भक्ति गोविंद राधे।
14याते निज मन ध्यान में लगा दे॥ 4358॥
15जिसका हो जप आदि गोविंद राधे।
16उसका रूपध्यान योग दर्शन बता दे॥ 4359॥
17सतयुग में ध्यान मुख्य गोविंद राधे।
18त्रेता में मख द्वापर पूजा बता दे॥ 4360॥
19कलि नाम कीर्तन गोविंद राधे।
20किन्तु रूपध्यान सब युग में करा दे॥ 4361॥
21मन ते रूपध्यान करो गोविंद राधे।
22रसना ते नाम गुन कीर्तन करा दे॥ 4362॥
23कभु हरि सन्मुख गोविंद राधे।
24कभु उर कभु जग वस्तु में बिठा दे॥ 4363॥