Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 373
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1कृष्ण प्रेमी वर माँगे गोविंद राधे।
2मेरे तनु कोटि कोटि कान बना दे॥ 4316॥
3याते श्याम प्यारे के गोविंद राधे।
4जी भर सुनूँ गुणगान बता दे॥ 4317॥
5पृथु ने वर माँगा गोविंद राधे।
6हरि कथा हित कोटि कर्ण बना दे॥ 4318॥
7कृष्ण नाम गुण तजि गोविंद राधे।
8और शब्द कान को भाये ना बता दे॥ 4319॥
9ऐसे ही स्पर्श रूप गोविंद राधे।
10रस गंध जग का भाये ना बता दे॥ 4320॥
11जग जनि छोड़ो मन गोविंद राधे।
12जग कामना छोड़ो काम बना दे॥ 4321॥
13जग कामना बना के गोविंद राधे।
14काम ना बना हरि कामना बना दे॥ 4322॥
15हरि कामना बना के गोविंद राधे।
16जग कामना निर्मूल नसा दे॥ 4323॥
17जग जो कृपा करे गोविंद राधे।
18लख चौरासी द्वार घुमा दे॥ 4324॥
19हरि जो कृपा करे गोविंद राधे।
20नित्यज्ञान नित्यआनन्द दिला दे॥ 4325॥
21हरि जो कृपा करे गोविंद राधे।
22आपु को ही क्रीतदास बना दे॥ 4326॥
23सब कामनाएँ तजि गोविंद राधे।
24श्यामा श्याम मिलन की कामना बढ़ा दे॥ 4327॥