Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 372
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1क्रोध पै क्रोध करो गोविंद राधे।
2अपकारी पै क्रोध करो ना बता दे॥ 4304॥
3क्रोध करो तुम बिनु गोविंद राधे।
4जीना क्या जीना मुझे मौत बुला दे॥ 4305॥
5लोभ यह प्रेम मेरा गोविंद राधे।
6मैं भी बढ़ाऊँ अरु तू भी बढ़ा दे॥ 4306॥
7अभिमान मेरा स्वामी गोविंद राधे।
8मैं हूँ दास और कछु अभिमान ना दे॥ 4307॥
9पाँच ही हैं तेरे काम गोविंद राधे।
10पाँचों काम मूढ़ मन श्याम का बना दे॥ 4308॥
11शब्द, स्पर्श, रूप आदि गोविंद राधे।
12विष जग के हैं रस हरि के बता दे॥ 4309॥
13श्रोत्र, नेत्र, नासा, त्वक् गोविंद राधे।
14रसना को हरि का विषय दिला दे॥ 4310॥
15नेत्र हरि दर्शन गोविंद राधे।
16श्रोत्र ते हरिकथा श्रवण करा दे॥ 4311॥
17त्वचा ते संश्लेष गोविंद राधे।
18नासा ते दिव्य तनुगन्ध दिला दे॥ 4312॥
19रसना ते उच्छिष्ट गोविंद राधे।
20कृष्ण का भोग प्रसाद खिला दे॥ 4313॥
21कृष्ण प्रेमी वर माँगे गोविंद राधे।
22मेरे तनु कोटि कोटि नेत्र बना दे॥ 4314॥
23याते प्राणधन को मैं गोविंद राधे।
24जी भर देखूँ दिन रात बता दे॥ 4315॥