Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 371
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1काम अग्नि ज्वाला सम गोविंद राधे।
2विषयभोग घृत सम ज्वाला बढ़ा दे॥ 4292॥
3बार बार स्वर्ग सुख गोविंद राधे।
4भोगा किन्तु भोग भोग वासना बढ़ा दे॥ 4293॥
5काम क्रोध लोभ शत्रु गोविंद राधे।
6श्रीकृष्ण भक्ति बिनु जायें ना बता दे॥ 4294॥
7भक्ति ते ही माया जाय गोविंद राधे।
8तब काम क्रोध लोभ जायँ बता दे॥ 4295॥
9हरि की कृपा बिनु गोविंद राधे।
10काम क्रोध लोभ जाना धोखा बता दे॥ 4296॥
11काम क्रोध लोभ आदि गोविंद राधे।
12जग ते हटा के श्याम ही में लगा दे॥ 4297॥
13काम क्रोध भय स्नेह गोविंद राधे।
14आदि भाव भक्ति भी हरि ते मिला दे॥ 4298॥
15चिन्तामणि में ज्योँ गोविंद राधे।
16दीपबुद्धि चिन्तामणि ही दिला दे॥ 4299॥
17ऐसे श्रीकृष्ण में भी गोविंद राधे।
18जार या शत्रुभाव कृष्ण ते मिला दे॥ 4300॥
19राग ब्रज गोपियों को गोविंद राधे।
20द्वेष शिशुपाल को भी हरि का बना दे॥ 4301॥
21काम क्रोध लोभ आदि गोविंद राधे।
22कृष्ण प्रति हो तो वाय दिव्य बता दे॥ 4302॥
23गोपी काम क्रोध लोभ गोविंद राधे।
24प्रिय सुख हित ही था भक्त को बता दे॥ 4303॥