Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 370
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1अपने इष्ट में ही गोविंद राधे।
2हो अनन्यता यह ज्ञान करा दे॥ 4280॥
3अपने साधन में गोविंद राधे।
4हो अनन्यता यह ज्ञान करा दे॥ 4281॥
5अपने आचार्य में गोविंद राधे।
6हो अनन्यता यह ज्ञान करा दे॥ 4282॥
7उपर्युक्त अतिरिक्त गोविंद राधे।
8यदि कहीं मन हो सक्त बता दे॥ 4283॥
9वह है कुसंग अति गोविंद राधे।
10साधक को यह ज्ञान भी करा दे॥ 4284॥
11परदोष देखे या गोविंद राधे।
12सुने भी नहीं यह भी समझा दे॥ 4285॥
13सर्वदा सर्वत्र गोविंद राधे।
14उपर्युक्त सब ज्ञान बुद्धि में बिठा दे। 4286॥
15तनु है क्षणिक यह गोविंद राधे।
16ज्ञान जानि हरि भक्ति तुरत करा दे॥ 4287॥
17संसार सिन्धु सम गोविंद राधे।
18इसमें मगर भक्षक छे बता दे॥ 4288॥
19काम क्रोध लोभ मोह गोविंद राधे।
20मद मात्सर्य छे हैं मगर बता दे॥ 4289॥
21ज्ञानी योगी को भी गोविंद राधे।
22काम आदि मगर ना छोड़ें बता दे॥ 4290॥
23विश्वामित्र को देखो गोविंद राधे।
24क्रोध ते त्रिशंकु हित स्वर्ग बना दे॥ 4291॥