Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 368
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1तैलधारावत गोविंद राधे।
2हरि स्मरण जो हो भक्ति बता दे॥ 4256॥
3सोइ जन्म सोई कर्म गोविंद राधे।
4सोइ मन है धन्य धन्य बता दे॥ 4257॥
5जो तैलधारावत गोविंद राधे।
6श्रीकृष्ण का करे स्मरण बता दे॥ 4258॥
7श्रीकृष्ण प्रेम में तो गोविंद राधे।
8भूल जाना है असम्भव बता दे॥ 4259॥
9विस्मरण हो यदि गोविंद राधे।
10वह प्रेम प्रेम ही नहीं है बता दे॥ 4260॥
11सुगम भी अगम भी गोविंद राधे।
12जैसी भावना हो भक्ति वैसी बना दे॥ 4261॥
13भक्ति भी कठिन हो तो गोविंद राधे।
14हरि शरणागति काम बना दे॥ 4262॥
15मन की प्रपत्ति ऐसी गोविंद राधे।
16भक्ति विरक्ति अरु ज्ञान करा दे॥ 4263॥
17मन ते ही ध्यानयुक्त गोविंद राधे।
18भक्ति है वास्तविक भक्ति बता दे॥ 4264॥
19मन ही है भक्ति कर्ता गोविंद राधे।
20शेष इन्द्रियों को साथ सेवा दिला दे॥ 4265॥
21इन्द्रियों की भक्ति ऐसी गोविंद राधे।
22जैसे कोइ प्राणहीन शव को सजा दे॥ 4266॥
23साधन अनन्त किये गोविंद राधे।
24मन को लगाया नहिं भूल बता दे॥ 4267॥