Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 367
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1निष्काम धर्म अरु गोविंद राधे।
2भक्ति मन शुद्ध करे अन्तर बता दे॥ 4244॥
3निष्काम धर्म तो गोविंद राधे।
4चित्त ते दोष निकाले बता दे॥ 4245॥
5दोष निकाले अरु गोविंद राधे।
6करे गुणाधान भी भक्ति बता दे॥ 4246॥
7वासना नाश ते गोविंद राधे।
8शुद्ध भक्ति ही हो उदित बता दे॥ 4247॥
9पूर्ण वासना नाश तो गोविंद राधे।
10विशुद्ध सत्व प्राप्ति ते हो बता दे॥ 4248॥
11विशुद्ध सत्व ते ही गोविंद राधे।
12प्राकृत मन भी हो दिव्य बता दे॥ 4249॥
13विशुद्ध भक्ति दो गोविंद राधे।
14जड़ देह अरु चिद्देह गत बता दे॥ 4250॥
15साधना भक्ति नव गोविंद राधे।
16जड़ देह द्वारा जड़ देहगत बता दे॥ 4251॥
17श्रीकृष्ण भक्ति नव गोविंद राधे।
18भाव देह द्वारा चिद्देहगत बता दे॥ 4252॥
19जड़ देहगत भक्ति गोविंद राधे।
20दो हैं इन्द्रिय अरु मन ते बता दे॥ 4253॥
21मन की है भक्ति भक्ति गोविंद राधे।
22तैलधारावत मन को लगा दे॥ 4254॥
23देश काल नियम नहिं गोविंद राधे।
24श्रद्धा भक्ति युक्त होके मन को लगा दे॥ 4255॥