Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 366
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1पापजन्य प्रतिबंध गोविंद राधे।
2कृष्णभक्ति ते ही मिटेंगे बता दे॥ 4232॥
3सभी जीव कर्मों के गोविंद राधे।
4बन्धन में ही दुख भोगें बता दे॥ 4233॥
5जो जीव हरिभक्त गोविंद राधे।
6वे ही सदा सुख भोगें बता दे॥ 4234॥
7कर्मों के बन्धन को गोविंद राधे।
8काटने में भक्ति तलवार बता दे॥ 4235॥
9संसार बन्धन गोविंद राधे।
10कारण गुणयुक्त कर्म बता दे॥ 4236॥
11कर्मों का कारण गोविंद राधे।
12इन्द्रियों की नाना वासना बता दे॥ 4237॥
13कोटि कोटि साधन ते गोविंद राधे।
14कर्म बीज वासनायें जायें ना बता दे॥ 4238॥
15एकमात्र कृष्णभक्ति गोविंद राधे।
16सब रोगों की औषधि बता दे॥ 4239॥
17जैसे भुक्त अन्नों को गोविंद राधे।
18जठराग्नि अपने आप जला दे॥ 4240॥
19वैसे ही विशुद्ध भक्ति गोविंद राधे।
20पंचकोश अपने आप जला दे॥ 4241॥
21भभकती आग जैसे गोविंद राधे।
22काष्ठ के ढेर को राख बना दे॥ 4242॥
23ऐसे ही भक्ति मेरी गोविंद राधे।
24सारे पाप पुण्यों को तुरत जला दे॥ 4243॥