Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 365
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1भक्ति तो नित्य बढ़े गोविंद राधे।
2किन्तु कभु होता ना अन्त बता दे॥ 4220॥
3भक्ति ते हरि मिलें गोविंद राधे।
4हरि ते मिले भक्ति भक्ति बढ़ा दे॥ 4221॥
5फिर हरि फिर भक्ति गोविंद राधे।
6फिर हरि फिर भक्ति अन्त ना बता दे॥ 4222॥
7भक्ति अनुकम्पा में गोविंद राधे।
8निमित्त नैमित्तिक भाव बता दे॥ 4223॥
9जैसे बीज ते वृक्ष गोविंद राधे।
10जैसे वृक्ष ते बीज दोनों बता दे॥ 4224॥
11भक्त की कोमलता गोविंद राधे।
12भक्त की वास्तविक सिद्धि बता दे॥ 4225॥
13भक्ति की मधुरता ही गोविंद राधे।
14भक्त का है अमृतत्व बता दे॥ 4226॥
15भक्ति में अतृप्ति ही है गोविंद राधे।
16प्रेमीजन वाय तृप्ति बता दे॥ 4227॥
17भक्त की प्यास ही गोविंद राधे।
18भक्त की सच्ची तृप्ति बता दे॥ 4228॥
19भक्ति अनुभवरूपा गोविंद राधे।
20विरले ही उर में हो प्रकट बता दे॥ 4229॥
21भक्ति के पथ में तो गोविंद राधे।
22पुण्य पाप दोनों हैं बाधा बता दे॥ 4230॥
23पुण्यजन्य प्रतिबंध गोविंद राधे।
24कृष्णभक्ति ते ही मिटेंगे बता दे॥ 4231॥