Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 358
Reading 369 of 516 · Source nos. 4136–4147 · Source PDF 375
1आग में तपाने ते गोविंद राधे।
2सोना ज्यों मल तजि शुद्ध हो बता दे॥ 4136॥
3ऐसे ही भक्ति ते भी गोविंद राधे।
4मन वासना तजि शुद्ध हो बता दे॥ 4137॥
5भक्ति तो है माता सम गोविंद राधे।
6जीव है सुत सम मलयुत बता दे॥ 4138॥
7माता सुत-मल धोके गोविंद राधे।
8स्वच्छ बना के हरि गोद में बिठा दे॥ 4139॥
9पिया मोते रूठा है गोविंद राधे।
10भक्ति सखि कृपा करि पिया को मना दे॥ 4140॥
11भक्त भक्ति भगवान गोविंद राधे।
12तीनों का भली भाँति ज्ञान करा दे॥ 4141॥
13भक्ति भक्त भगवान गोविंद राधे।
14सब हैं परस्पर एक सबको बता दे॥ 4142॥
15भक्ति भगवत्स्वरूप गोविंद राधे।
16दोनों में भेद मूढ़ बता दे॥ 4143॥
17भक्त भगवान दोनों गोविंद राधे।
18भक्ति केआधीन भक्तों को बता दे॥ 4144॥
19आपु हरि मुट्ठी में गोविंद राधे।
20हरि आपु मुट्ठी में भक्ति करा दे॥ 4145॥
21भक्ति बिनु भगवान गोविंद राधे।
22भगवान बिनु भक्ति रहे ना बता दे॥ 4146॥
23भक्ति की प्राप्ति ते गोविंद राधे।
24सब साध्य कहें भक्त सेवा दिला दे॥ 4147॥