Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 357
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1श्रीकृष्ण प्राप्ति ते गोविंद राधे।
2भक्त के कर्म सब भस्म हों बता दे॥ 4124॥
3श्रीकृष्ण प्राप्ति ते गोविंद राधे।
4माया का अत्यन्ताभाव हो बता दे॥ 4125॥
5दो हैं प्रमुख ग्रह गोविंद राधे।
6एक है माया एक कृष्ण बता दे॥ 4126॥
7जीव तो सदा ही गोविंद राधे।
8मायाग्रह ते गृहीत है बता दे॥ 4127॥
9कृष्णग्रह लगे जब गोविंद राधे।
10मायाग्रह तब ही छोड़े बता दे॥ 4128॥
11प्रह्लाद बालक गोविंद राधे।
12कृष्णरूपीग्रह ते थे ग्रस्त बता दे॥ 4129॥
13कभू तो वियोग भाव गोविंद राधे।
14युक्त करते थे रुदन बता दे॥ 4130॥
15कभू तो मिलन भाव गोविंद राधे।
16अपना कर हँसें नाचें बता दे॥ 4131॥
17कभु तन्मयता में गोविंद राधे।
18अपने आप में कृष्ण भाव ला दे॥ 4132॥
19जब लौं साधक तनु गोविंद राधे।
20स्तंभ स्वेद रोमांच हो ना बता दे॥ 4133॥
21जब लौं साधक तनु गोविंद राधे।
22स्वरभेद कम्प अश्रु हो ना बता दे॥ 4134॥
23तब लौं हृदय की गोविंद राधे।
24शुद्धि पूर्ण रूप ते ना होगी बता दे॥ 4135॥