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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भक्ति · पृष्ठ 354

Reading 365 of 516 · Source nos. 4088–4099 · Source PDF 371

1इन्द्रिय मन बुद्धि गोविंद राधे।

2परे हैं यद्यपि कृष्ण बता दे॥ 4088॥

3किन्तु स्वरूप शक्ति गोविंद राधे।

4जीव की इन्द्रियादि दिव्य बना दे॥ 4089॥

5स्वरूप शक्ति ते हो गोविंद राधे।

6मन दिव्य दिव्य रूपध्यान करा दे॥ 4090॥

7इन्द्रिय मन दिव्य गोविंद राधे।

8दिव्य हरि का रस ग्रहण करा दे॥ 4091॥

9“अपि संराधने” गोविंद राधे।

10सूत्र कह हरिभक्ति ग्राह्य है बता दे॥ 4092॥

11भक्ति ते चित्त शुद्धि गोविंद राधे।

12कर्म ज्ञान ते शुद्धि ना हो बता दे॥ 4093॥

13मन जब शुद्ध हो तो गोविंद राधे।

14श्रीकृष्ण मन में स्वरूप शक्ति ला दे॥ 4094॥

15मन तब दिव्य बने गोविंद राधे।

16तब करे दिव्य प्रेम धारण बता दे॥ 4095॥

17प्रेम बिनु माँगे मिले गोविंद राधे।

18प्रथम शुद्ध मनरूपी पात्र बना दे॥ 4096॥

19जननी तो साधन भक्ति गोविंद राधे।

20सुता भावभक्ति सिद्ध भक्ति ना बता दे॥ 4097॥

21साधन भक्ति जीव करे गोविंद राधे।

22सिद्घा भक्ति हरि गुरु द्वारा दिला दे॥ 4098॥

23कृष्णभक्ति चित्त को गोविंद राधे।

24स्वरूप शक्ति तादात्म्य करा दे॥ 4099॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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