Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 348
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1किन्तु विशुद्धा भक्ति गोविंद राधे।
2विशुद्ध भक्तों को ही दें बता दे॥ 4016॥
3धन रूप तप बल गोविंद राधे।
4कृष्ण प्रीति हित ना समर्थ बता दे॥ 4017॥
5श्रीकृष्ण प्रीति हित गोविंद राधे।
6एकमात्र भक्ति समर्थ बता दे॥ 4018॥
7हरि सुख हित जो गोविंद राधे।
8भक्ति माँगे वाको दें भक्ति बता दे॥ 4019॥
9सबते बड़ी बाधा गोविंद राधे।
10भक्ति में एकत्व मुक्ति बता दे॥ 4020॥
11भक्ति में दूजी बाधा गोविंद राधे।
12ब्रह्मलोक पर्यन्त भुक्ति बता दे॥ 4021॥
13दिव्य प्रेम तेरा लक्ष्य गोविंद राधे।
14धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष धोखा बता दे॥ 4022॥
15प्रेम ते जो प्रेम मिले गोविंद राधे।
16वही प्रेम प्रेमी को सेवा दिला दे॥ 4023॥
17साधन साध्य नहिं गोविंद राधे।
18नित्य सिद्ध कृष्णप्रेम रसिक बता दे॥ 4024॥
19कृपा साध्य कृष्णप्रेम गोविंद राधे।
20साधना ते तो मन पात्र बना दे॥ 4025॥
21साध्य भी दे सद्गुरु गोविंद राधे।
22साधना भी सद्गुरु जीव को बता दे॥ 4026॥
23कृष्ण भक्ति जन्म मूल गोविंद राधे।
24भक्ति और भक्त दोनों हैं बता दे॥ 4027॥