Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 344
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1सब साध्य मृत्युशील गोविंद राधे।
2एक मात्र भक्ति अमरत्व दिला दे॥ 3968॥
3साधन अरु साध्य गोविंद राधे।
4दोनों ही भक्ति सुख रूप बता दे॥ 3969॥
5साध्य शिरोमणि तो गोविंद राधे।
6कृष्ण सुख तात्पर्य सेवा बता दे॥ 3970॥
7दारुक द्वारिका में गोविंद राधे।
8कृष्ण को पंखा करे सुखी हो बता दे॥ 3971॥
9दारुक प्रेमसुख में गोविंद राधे।
10सेवा भूला सुख को कोसा बता दे॥ 3972॥
11भक्त एक भक्ति माँगे गोविंद राधे।
12भक्ति जब मिले सेव्य सेवा दिला दे॥ 3973॥
13भक्ति का मुख्य फल गोविंद राधे।
14दिव्य प्रेमयुक्त कृष्णसेवा बता दे॥ 3974॥
15आनुषंगिक फल गोविंद राधे।
16मायानिवृत्ति अपवर्ग बता दे॥ 3975॥
17आनुषंगिक फल गोविंद राधे।
18चित्त का निरोध स्वयमेव करा दे॥ 3976॥
19आनुषंगिक फल गोविंद राधे।
20काम क्रोध आदि को सदा को नसा दे॥ 3977॥
21आनुषंगिक फल गोविंद राधे।
22सत्य अहिंसा आदि दिलवा दे॥ 3978॥
23आनुषंगिक फल गोविंद राधे।
24त्रिगुण त्रिकर्म त्रिताप नसा दे॥ 3979॥