Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 328
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1प्रेमहीन साधना है गोविंद राधे।
2लवण बिनु जनु व्यंजन हो बता दे॥ 3776॥
3पूर्व में अनेक योगी गोविंद राधे।
4योग ते पाये नहिं कृष्ण को बता दे॥ 3777॥
5तब उन योगियों ने गोविंद राधे।
6श्रीकृष्ण की भक्ति की थी बता दे॥ 3778॥
7चाहे निष्काम ही हो गोविंद राधे।
8या हो सकाम कृष्ण भक्ति करा दे॥ 3779॥
9कोई काम कामी हो गोविंद राधे।
10कृष्णभक्ति सब का लक्ष्य दिला दे॥ 3780॥
11याते सकामी को भी गोविंद राधे।
12देवताओं की भक्ति त्याज्य बता दे॥ 3781॥
13सकाम कृष्ण भक्त गोविंद राधे।
14भक्त संग ते हो निष्काम बता दे॥ 3782॥
15कर्मी अरु ज्ञानी को गोविंद राधे।
16हरि भक्ति की है अपेक्षा बता दे॥ 3783॥
17जपी, तपी, ज्ञानी, योगी गोविंद राधे।
18भक्ति के आगे सब सिर को झुका दें॥ 3784॥
19कर्म, ज्ञान, योग तीनों गोविंद राधे।
20भक्ति का मुँह ताकें मेरा फल दिला दे॥ 3785॥
21किन्तु हरि भक्ति तो है गोविंद राधे।
22सदा सर्वत्र निरपेक्ष बता दे॥ 3786॥
23भक्ति स्वयं प्रकाश गोविंद राधे।
24याको प्रमाण जड़ भरत बता दे॥ 3787॥