Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भक्ति · पृष्ठ 323
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1कर्म योग ज्ञान ते भी गोविंद राधे।
2आंशिक हरि सन्मुखता बता दे॥ 3716॥
3पूर्ण सन्मुखता तो गोविंद राधे।
4स्वरूपसिद्धा भक्ति ते हो बता दे॥ 3717॥
5याते कृष्ण भक्ति बिनु गोविंद राधे।
6माया की निवृत्ति हो ना बता दे॥ 3718॥
7शंकराचार्य पूर्व गोविंद राधे।
8भक्ति का ही प्रमुख प्रचार था बता दे॥ 3719॥
9शंकर के पश्चात् गोविंद राधे।
10भक्ति का ही प्रमुख प्रचार था बता दे॥ 3720॥
11श्रीकृष्ण भक्ति बिनु गोविंद राधे।
12तीव्र वैराग्य भी मिथ्या बता दे॥ 3721॥
13श्रीकृष्ण भक्ति हित गोविंद राधे।
14साधु संग साधु की शरण बता दे॥ 3722॥
15“भजनं भक्तिरिति” गोविंद राधे।
16भाव मन ते नित मनन बता दे॥ 3723॥
17“भागो भक्तिरिति” गोविंद राधे।
18भाव मैं हूँ हरि का ही भाग बता दे॥ 3724॥
19“भंजनं भक्तिरिति” गोविंद राधे।
20भाव यह भक्ति पंचकोश को जला दे॥ 3725॥
21“भज्यते भक्तिरिति” गोविंद राधे।
22भाव मन हरि का ही ध्यान करा दे॥ 3726॥
23भज् धातु अर्थ सेवा गोविंद राधे।
24याते भक्ति शब्द अर्थ सेवा बता दे॥ 3727॥