Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 298
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1निर्ग्रन्थ शुकदेव गोविंद राधे।
2मोहे ऐसे हैं हरि गुण ही बता दे॥ 3427॥
3“वर्हापीडं” श्लोक गोविंद राधे।
4शुक को समाधि निर्विकल्प ते जगा दे॥ 3428॥
5ग्वाल संग गोपाल गोविंद राधे।
6वृन्दावन धाम आ रहे बता दे॥ 3429॥
7श्याम के सिर पै गोविंद राधे।
8दिव्य मयूर पुच्छ शोभित बता दे॥ 3430॥
9कानों में कनेर के गोविंद राधे।
10पीले पुष्प कान की शोभा बढ़ा दे॥ 3431॥
11श्याम के शरीर पै गोविंद राधे।
12दिव्य पीताम्बर चमक दिखा दे॥ 3432॥
13पंच विध पुष्पों की गोविंद राधे।
14गल विलुलित वनमाला बता दे॥ 3433॥
15जैसे रंगमंच पै गोविंद राधे।
16अभिनय करता नट हो बता दे॥ 3434॥
17मुरली के छिद्रों में गोविंद राधे।
18अधरामृत भर रहे हैं बता दे॥ 3435॥
19पाछे पाछे ग्वाल बाल गोविंद राधे।
20श्याम गुणगान कर रहे हैं बता दे॥ 3436॥
21वैकुण्ठ ते श्रेष्ठ गोविंद राधे।
22वृन्दावन धाम बन गया बता दे॥ 3437॥
23श्याम पद चिह्नों ते गोविंद राधे।
24वृन्दावन अति रमणीय बता दे॥ 3438॥