Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 296
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1गोपी प्रेम लखि ऊधो गोविंद राधे।
2निज ज्ञान प्रेमसिंधु माहिं बहा दे॥ 3403॥
3ऊधो से ज्ञानी माँगें गोविंद राधे।
4ब्रज में लता पता मोहिं बना दे॥ 3404॥
5श्रीकृष्ण ने कहा था गोविंद राधे।
6ऊधो मोते नेकु न्यून ना बता दे॥ 3405॥
7ऊधो के समान नहिं गोविंद राधे।
8प्रिय बलराम अरु लक्ष्मी बता दे॥ 3406॥
9उन ऊधो की भी गोविंद राधे।
10कामना थी कैसी विचित्र बता दे॥ 3407॥
11वृन्दावन में मैं गोविंद राधे।
12लता गुल्म बनूँ मानूँ धन्य बता दे॥ 3408॥
13प्रेम के भिखारी नहिं गोविंद राधे।
14ब्रजवासी तो प्रेमधनी हैं बता दे॥ 3409॥
15शुकदेव सनकादि गोविंद राधे।
16जन्म ते ही थे ब्रह्मज्ञानी बता दे॥ 3410॥
17व्याससुत शुकदेव गोविंद राधे।
18समदर्शी महायोगी बता दे॥ 3411॥
19भेदभाव ते रहित गोविंद राधे।
20मोह निद्रा ते जागे बता दे॥ 3412॥
21एकमात्र ब्रह्म में ही गोविंद राधे।
22रहते थे नित्य युक्त बता दे॥ 3413॥
23स्वयं को छुपाते थे गोविंद राधे।
24याते लगें महामूढ़ थे बता दे॥ 3414॥