Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 286
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1हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
2श्री परमहंस परमहंस को बना दे॥ 3283॥
3हरि के चरित्र सुनि गोविंद राधे।
4मुक्त को मिले हरिभक्ति बता दे॥ 3284॥
5“मुक्ता अपि हि” मंत्र गोविंद राधे।
6मुक्त तनु धरि करे भक्ति बता दे॥ 3285॥
7“मुक्तोपसृप्य” सूत्र गोविंद राधे।
8कह मुक्त भी करे भक्ति बता दे॥ 3286॥
9“मुक्ता अपि लीलया” गोविंद राधे।
10शंकराचार्य की है उक्ति बता दे॥ 3287॥
11भाव यह मुक्त भी गोविंद राधे।
12तनु धरि करे हरि भक्ति बता दे॥ 3288॥
13मुक्तों के शरीर नहिं गोविंद राधे।
14है भी शरीर दोनों व्यास बता दे॥ 3289॥
15मुक्त तो ब्रह्मलीन गोविंद राधे।
16मन ते रहित इच्छा कैसे बता दे॥ 3290॥
17पुनि निज इच्छा ते गोविंद राधे।
18तनु धारण करे कैसे बता दे॥ 3291॥
19भक्ति या भक्त की गोविंद राधे।
20कृपा ते भक्त देह प्राप्त हो बता दे॥ 3292॥
21हरि कृपा वाला गुण गोविंद राधे।
22ब्रह्मलीन ज्ञानी को भी प्रेमी बना दे॥ 3293॥
23शुक सनकादि मुक्त गोविंद राधे।
24हरि कथा के हुये हैं रसिक बता दे॥ 3294॥