Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 285
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1हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
2विश्व विमोहन काम को हरा दे॥ 3271॥
3हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
4खड़े खड़े देखे जो भी धरा पै गिरा दे॥ 3272॥
5हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
6ब्रह्मलीन को भी प्रेमसिन्धु में डुबा दे॥ 3273॥
7हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
8ब्रह्मलीन को भी ब्रज वृक्ष बना दे॥ 3274॥
9हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
10जाकी भावना हो जैसी वैसा दिखा दे॥ 3275॥
11हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
12जाकी कोइ माधुर्य सीमा न बता दे॥ 3276॥
13बार बार देखने ते गोविंद राधे।
14जग रूप रस घटि जात बता दे॥ 3277॥
15बार बार देखने ते गोविंद राधे।
16हरि रूप रस बढ़ि जात बता दे॥ 3278॥
17हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
18राधा जाने किन्तु मुख ते ना बता दे॥ 3279॥
19हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
20आत्मज्ञानी को ब्रह्मज्ञानी बना दे॥ 3280॥
21हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
22जनक विदेह को सदेह बना दे॥ 3281॥
23हरि का स्वरूप ऐसा गोविंद राधे।
24शुक सनकादि समाधि भुला दे॥ 3282॥