Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 280
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1ज्ञान ते हो परतीति गोविंद राधे।
2परतीति ते प्रीति याते जना दे॥ 3211॥
3साकार नित्यानित्य गोविंद राधे।
4क्योंकि हरि दो विरोधी धर्मी बता दे॥ 3212॥
5साकार दो प्रकार गोविंद राधे।
6एक उपाधि युक्त जगत बता दे॥ 3213॥
7साकार दूसरा है गोविंद राधे।
8निरुपाधि हरि का स्वरूप बता दे॥ 3214॥
9सृष्टिपूर्व ब्रह्म ने गोविंद राधे।
10सोचा भी देखा भी कैसे बता दे॥ 3215॥
11सृष्टिपूर्व मन नेत्र गोविंद राधे।
12प्राकृत बने ही नहीं थे समझा दे॥ 3216॥
13याते हरि मन नेत्र गोविंद राधे।
14दिव्य चिन्मय ही रहे होंगे बता दे॥ 3217॥
15शरीरेन्द्रिय मन गोविंद राधे।
16हरि केहैं दिव्य याते रहित बता दे॥ 3218॥
17पुराण इतिहास गोविंद राधे।
18हरि को सगुण साकार बता दे॥ 3219॥
19“अपाणिपादो” अर्थ गोविंद राधे।
20प्राकृत इन्द्रिय ना दिव्य हैं बता दे॥ 3220॥
21वेद कहे सृष्टिपूर्व गोविंद राधे।
22ब्रह्म ने देखा याते तनु है बता दे॥ 3221॥
23वेद कहे सृष्टिपूर्व गोविंद राधे।
24ब्रह्म मुस्कुराया याते तनु है बता दे॥ 3222॥