Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 279
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1जीव कर्म माया ते हो गोविंद राधे।
2हरि कर्म दिव्य योगमाया करा दे॥ 3199॥
3हरि तो है चिदानंद गोविंद राधे।
4जीव मायाधीन वाको दोष बता दे॥ 3200॥
5बुद्धि यदि जाने हरि गोविंद राधे।
6ज्ञानी जन बुधि को ही ब्रह्म बता दे॥ 3201॥
7हरि को को जानि सके गोविंद राधे।
8ब्रह्मा सा ज्ञानी जब ज्ञान गमा दे॥ 3202॥
9नेति कह श्रुति छन्द गोविंद राधे।
10वाणी की हो वाणी बन्द हरि ही जना दे॥ 3203॥
11इन्द्रिय पर मन गोविंद राधे।
12मन बुधि ते परे हरि है बता दे॥ 3204॥
13बुद्धि का प्रकाशक गोविंद राधे।
14बुद्धि है प्रकाश्य कैसे ज्ञान करा दे॥ 3205॥
15शारदा न जाने वाको गोविंद राधे।
16जाने भगवान भगवान को बता दे॥ 3206॥
17कागभुशुंडी गरुड़ गोविंद राधे।
18पक्षी भी जाने यदि हरि ही जना दे॥ 3207॥
19पाया न अंत कोई गोविंद राधे।
20कृष्ण का कृष्ण ने भी वेद बता दे॥ 3208॥
21सगुण साकार रूप गोविंद राधे।
22ज्ञान अनिवार्य ज्ञान प्रेम करा दे॥ 3209॥
23हरि ज्ञान ते हो प्रेम गोविंद राधे।
24प्रेम मन शुद्ध करि प्रेम दिला दे॥ 3210॥