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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

ज्ञान · पृष्ठ 265

Reading 276 of 516 · Source nos. 3031–3042 · Source PDF 282

1यदि जीव ब्रह्म ही है गोविंद राधे।

2तो कैसे मायाधीन हुआ है बता दे॥ 3031॥

3ब्रह्म प्रकाश नाश गोविंद राधे।

4अज्ञान ते ब्रह्म नाश बता दे॥ 3032॥

5कोई कह ब्रह्म में गोविंद राधे।

6हो गया प्रविष्ट अज्ञान बता दे॥ 3033॥

7कोई कह ब्रह्म ही गोविंद राधे।

8हो गया प्रविष्ट अज्ञान में बता दे॥ 3034॥

9उपर्युक्त दोनों ही गोविंद राधे।

10सर्वथा असंभव ही हैं बता दे॥ 3035॥

11ब्रह्म प्रकाश रूप गोविंद राधे।

12अज्ञान तम रूप वेद बता दे॥ 3036॥

13“वेदाहमेतं” मंत्र गोविंद राधे।

14तम ते परे प्रकाश ब्रह्म बता दे॥ 3037॥

15ब्रह्म अरु अज्ञान गोविंद राधे।

16दोनों परस्पर विरोधी बता दे॥ 3038॥

17तम ते हो रस्सी में गोविंद राधे।

18द्रष्टा को ही भय सर्प का बता दे॥ 3039॥

19द्रष्टा न माने सर्प गोविंद राधे।

20आपु को ही जग में कबहूँ बता दे॥ 3040॥

21नवजात शिशु जग गोविंद राधे।

22माता पिता को नहिं जाने बता दे॥ 3041॥

23याते न नर शिशु गोविंद राधे।

24पशु पक्षी बनि जाये बता दे॥ 3042॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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