Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 244
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1सिन्धु की तो है तरंग गोविंद राधे।
2तरंग का नहिं सिन्धु बता दे॥ 2779॥
3शंकर तात्पर्य गोविंद राधे।
4हम में तुम में है भेद बता दे॥ 2780॥
5भेद बुद्धि माने बिनु गोविंद राधे।
6कृष्ण रस भोग असम्भव बता दे॥ 2781॥
7ज्ञानी को मृत्यु तक गोविंद राधे।
8वेदान्त हरि गुरु वंद्य हैं बता दे॥ 2782॥
9ज्ञानी कहे जग मिथ्या गोविंद राधे।
10किन्तु संसार तो रहेगा बता दे॥ 2783॥
11भक्त कहे सब श्याम गोविंद राधे।
12किन्तु संसार तो रहेगा बता दे॥ 2784॥
13भक्तों को यह जग गोविंद राधे।
14श्रीकृष्ण युक्त ही दीखे बता दे॥ 2785॥
15भक्तिरहित को तो गोविंद राधे।
16कृष्ण भी दीखें दुखरूप बता दे॥ 2786॥
17भक्तिहीन सब मिथ्या गोविंद राधे।
18भक्तियुक्त जग गोलोक बना दे॥ 2787॥
19भक्त को भवसिन्धु गोविंद राधे।
20अरु गोलोक समान हैं बता दे॥ 2788॥
21कछु भोले कह गोविंद राधे।
22भक्त को मिले ब्रह्मलोक बता दे॥ 2789॥
23ब्रह्मलोक गोलोक गोविंद राधे।
24दोनों हैं पर्यायवाची बता दे॥ 2790॥