Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 236
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1ज्ञानी मन मायिक गोविंद राधे।
2मायिक मन ध्यान मायिक बता दे॥ 2683॥
3ज्ञानी का ध्यान तो है गोविंद राधे।
4स्वरूप शक्ति बिना प्राकृत बता दे॥ 2684॥
5भक्तों के मन को तो गोविंद राधे।
6शुद्ध स्वरूप शक्ति दिव्य बना दे॥ 2685॥
7मन की उपाधि पै गोविंद राधे।
8ज्ञानी को हो ब्रह्म दर्शन बता दे॥ 2686॥
9निरुपाधि ब्रह्म का हो गोविंद राधे।
10अनुभव मरणोपरान्त बता दे॥ 2687॥
11निर्विशेष ज्ञानी की गोविंद राधे।
12जब हो दशा परिपक्व बता दे॥ 2688॥
13तब हो प्राप्त उसे गोविंद राधे।
14समाधि भी निर्विकल्प बता दे॥ 2689॥
15निर्विकल्प को ही कह गोविंद राधे।
16असंप्रज्ञात समाधि बता दे॥ 2690॥
17ऐसी समाधि में गोविंद राधे।
18ध्याता ध्येय ध्यान तीनों रहें ना बता दे॥ 2691॥
19भक्तों की समाधि में गोविंद राधे।
20ध्याता ध्येय ध्यान रहें तीनों बता दे॥ 2692॥
21काष्ठ की डिबिया में गोविंद राधे।
22भौंरा छेद करके भागे बता दे॥ 2693॥
23किन्तु पद्म पुष्प में तो गोविंद राधे।
24भौंरा, न भागे भले जान गमा दे॥ 2694॥