Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 223
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1“भक्तिं मयि परां” श्लोक गोविंद राधे। ”
2पूर्व करु भक्ति पुनि गीता सुना दे॥ 2527 ॥
3पांडित्य तजु मन गोविंद राधे।
4भोला शिशु बनि मन हरि में लगा दे॥ 2528॥
5उतना ही ज्ञान जानो गोविंद राधे।
6जितने में गुरु तोहिं हरि ते मिला दे॥ 2529॥
7ज्ञान है अनन्त किन्तु गोविंद राधे।
8तू तो साध्य साधन ज्ञान करा दे॥ 2530॥
9वह ज्ञान अज्ञान गोविंद राधे।
10श्यामा श्याम ते जो ना प्रेम करा दे॥ 2531॥
11जग में भी ज्ञान ते गोविंद राधे।
12प्रेम होता है सर्वत्र बता दे॥ 2532॥
13सुन्दरी स्वरूप गुण गोविंद राधे।
14हाव भाव ते ही हो प्रेम बता दे॥ 2533॥
15ब्रह्म ज्ञान ते भी यों गोविंद राधे।
16ब्रह्म में हो प्रेम अवशि बता दे॥ 2534॥
17ज्ञानी जब प्रेम पाये गोविंद राधे।
18ब्रह्म को तो अब जाना सबको बता दे॥ 2535॥
19प्रेम बिनु ज्ञान व्यर्थ गोविंद राधे।
20ऐसा ज्ञान अज्ञान ज्ञानी को बता दे॥ 2536॥
21धान की भूसी का गोविंद राधे।
22कूटना है व्यर्थ केवल श्रम है बता दे॥ 2537॥
23ऐसे हरिभक्ति बिनु गोविंद राधे।
24ज्ञान का प्रयास केवल श्रम है बता दे॥ 2538॥