Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
ज्ञान · पृष्ठ 222
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1व्यंजन बनाओ खाओ गोविंद राधे।
2तब ही हो तुष्टि पुष्टि आदि बता दे॥ 2515॥
3ऐसे श्रीकृष्ण में भी गोविंद राधे।
4मन ते करो भक्ति साध्य दिला दे॥ 2516॥
5राजा है ऐसा ऐसा गोविंद राधे।
6ज्ञान होने ते लाभ कछु ना बता दे॥ 2517॥
7राजा ते संबंध गोविंद राधे।
8जोड़ो तब ही कृपा मिलेगी बता दे॥ 2518॥
9भाव यह भक्ति बिनु गोविंद राधे।
10ब्रह्मज्ञान तो अभिमान बढ़ा दे॥ 2519॥
11अनुभवहीन ज्ञान गोविंद राधे।
12लख चौरासी योनि घुमा दे॥ 2520॥
13जानने का लाभ तब गोविंद राधे।
14जब जाने माने मन हरि में लगा दे॥ 2521॥
15शब्दज्ञान ज्ञान नहिं गोविंद राधे।
16यह ज्ञान ज्ञानाभिमान बढ़ा दे॥ 2522॥
17ज्ञानी कहे मैं ही ब्रह्म गोविंद राधे।
18“तुम मूर्ख” सुनि ब्रह्म ज्ञान भुला दे॥ 2523॥
19गधे पै चन्दन गोविंद राधे।
20गधा वाय केवल बोझ बता दे॥ 2524॥
21ऐसे ही वेद-वक्ता गोविंद राधे।
22भक्तिहीन हो तो वेद बोझ बता दे॥ 2525॥
23अज्ञों ते डरे वेद गोविंद राधे।
24मो पै करेगा प्रहार बता दे॥ 2526॥