Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
योग · पृष्ठ 218
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1कर्मी, ज्ञानी, योगी आदि गोविंद राधे।
2भक्ति बिना माया इन्हें मोह करा दे॥ 2477॥
3निराहार नर की भी गोविंद राधे।
4जाय नहिं मन की वासना बता दे॥ 2478॥
5योगी प्राण इन्द्रिय गोविंद राधे।
6वश में करे हारे मन ते बता दे॥ 2479॥
7दुर्वासा महान तपी गोविंद राधे।
8अम्बरीष जैसा भक्त उनको हरा दे॥ 2480॥
9विश्वामित्र से तपी का गोविंद राधे।
10भक्ति बिनु मेनका भी पतन करा दे॥ 2481॥
11बड़े बड़े ज्ञानी ध्यानी गोविंद राधे।
12लखि उर्वशी ध्यान मन का गवाँ दें॥ 2482॥
13वायु जल भोजी को भी गोविंद राधे।
14भक्ति बिनु, माया अग जग में घुमा दे॥ 2483॥
15योगी का किया हुआ गोविंद राधे।
16योग चित्तवृत्ति का निरोध बता दे॥ 2484॥
17विक्षेप काल में तो गोविंद राधे।
18चित्त का निरोध नहिं रहता बता दे॥ 2485॥
19हरि का किया हुआ गोविंद राधे।
20भक्ति का निरोध रहे नित्य बता दे॥ 2486॥
21मन परमात्मा में गोविंद राधे।
22जोड़ने का नाम है योग बता दे॥ 2487॥
23योगियों केध्यान में भी गोविंद राधे।
24सात्विक भाव प्रकट हों बता दे॥ 2488॥