Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
योग · पृष्ठ 215
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1संतोष गुरुसेवा गोविंद राधे।
2आदि सब ही हैं नियम बता दे॥ 2441॥
3ध्यान की परिभाषा गोविंद राधे।
4ध्येय में मन का लगाना बता दे॥ 2442॥
5धारणा की परिभाषा गोविंद राधे।
6ध्येय में मन लग जाना बता दे॥ 2443॥
7समाधि परिभाषा गोविंद राधे।
8ध्येय में मन लीन होना बता दे॥ 2444॥
9योग ते समाधि हो गोविंद राधे।
10चित्तवृत्ति का हो निरोध बता दे॥ 2445॥
11किन्तु जहाँ वृत्ति नहिं गोविंद राधे।
12वहाँ कछु भी व्यवहार ना बता दे॥ 2446॥
13जहाँ व्यवहार नहिं गोविंद राधे।
14वहाँ कछु रस भी नहीं है बता दे॥ 2447॥
15अद्वैतवाद में भी गोविंद राधे।
16द्वैत नहिं याते नहिं प्रेम बता दे॥ 2448॥
17समाधि में कर्म नहिं गोविंद राधे।
18किन्तु बाहर आते ही कर्म बता दे॥ 2449॥
19योगी समाधि पूर्व गोविंद राधे।
20जो सोचता करता था बता दे॥ 2450॥
21समाधि टूटने पै गोविंद राधे।
22फिर वही सोचेगा करेगा बता दे॥ 2451॥
23योग की समाधि एक गोविंद राधे।
24सुखाभाव की एक सुख की बता दे॥ 2452॥