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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कर्म · पृष्ठ 211

Reading 222 of 516 · Source nos. 2409–2420 · Source PDF 228

1मेरा भक्त ब्रह्मा पद गोविंद राधे।

2या इन्द्र पद नहिं चाहे बता दे॥ 2409॥

3मेरा भक्त योग सिद्धि गोविंद राधे।

4या अपवर्ग नहिं चाहे बता दे॥ 2410॥

5जोग यज्ञ जप तप गोविंद राधे।

6हरि ते मिला ना सके भक्ति मिला दे॥ 2411॥

7जो भी हो अप्राप्य गोविंद राधे।

8श्रीकृष्ण भक्ति उसे प्राप्त करा दे॥ 2412॥

9मन ते अगोचर जो गोविंद राधे।

10भक्ति अगोचर को भी गोचर बना दे॥ 2413॥

11पुत्रवती माता सोई गोविंद राधे।

12जो जाये सुत हरिभक्त बता दे॥ 2414॥

13यदि सुत भक्त ना हो गोविंद राधे।

14तो माता माता नहिं बाँझ बता दे॥ 2415॥

15गीता कह कर्म गुह्य गोविंद राधे।

16ज्ञान गुह्यतर भक्ति गुह्यतम बता दे॥ 2416॥

17कर्म की है सीमा ज्ञान गोविंद राधे।

18ज्ञान की है सीमा प्रेम सबको बता दे॥ 2417॥

19कर्म क्या है ज्ञान क्या है गोविंद राधे।

20भक्ति क्या है तीनों का उत्तर बता दे॥ 2418॥

21हरि निमित्त कर्म ज्ञान गोविंद राधे।

22हरि निमित्त भक्ति तीन उत्तर बता दे॥ 2419॥

23जिस कर्म धर्म ते भी गोविंद राधे।

24पिय सुख पावे सोई कर्म है बता दे॥ 2420॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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