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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

कर्म · पृष्ठ 209

Reading 220 of 516 · Source nos. 2385–2396 · Source PDF 226

1लोक वेद कुल धर्म गोविंद राधे।

2तजि जा शरण कृष्ण प्रेमसुधा दे॥ 2385॥

3हरि शरणागत को तो गोविंद राधे।

4तीनों ऋणों का नहिं बंधन बता दे॥ 2386॥

5एक है ऋषि ऋण गोविंद राधे।

6स्वाध्याय ते ऋषि ऋण को चुका दे॥ 2387॥

7एक है पितृ ऋण गोविंद राधे।

8पुत्र उत्पन्न करि ऋण को चुका दे॥ 2388॥

9एक है देव ऋण गोविंद राधे।

10यज्ञादि कर्म द्वारा ऋण को चुका दे॥ 2389॥

11देव ऋषि पितृ ऋण गोविंद राधे।

12तीनों ऋणों ते भक्ति उऋण करा दे॥ 2390॥

13सर्व धर्म तजि जो भी गोविंद राधे।

14शरण में आये वाय मुक्त करा दे॥ 2391॥

15सर्वधर्मान् में है गोविंद राधे।

16संन्यास धर्म का भी त्याग बता दे॥ 2392॥

17संन्यास शब्द अर्थ गोविंद राधे।

18कृष्ण को सर्व समर्पण बता दे॥ 2393॥

19संन्यासी साधक गोविंद राधे।

20आदर्श नर नारायण बता दे॥ 2394॥

21सिद्ध संन्यासी के गोविंद राधे।

22आदर्श हैं ऋषभ देव बता दे॥ 2395॥

23राम कर्मयोगी थे गोविंद राधे।

24ऋषभ संन्यासी कृष्ण दोनों बता दे॥ 2396॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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