Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 208
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1उत्तर है जब उसे गोविंद राधे।
2भक्तिरस का लगे चसका बता दे॥ 2373॥
3तब वह कर्मी भक्त गोविंद राधे।
4कर्म को आपु त्याग देगा बता दे॥ 2374॥
5कर्मी संस्कार वश गोविंद राधे।
6पूर्व कर्म में भी रुचि राखे बता दे॥ 2375॥
7ब्रह्मलोक तक के गोविंद राधे।
8सुखों का त्यागी जो ज्ञानी बता दे॥ 2376॥
9नवधा भक्ति में तो गोविंद राधे।
10जिसका हो दृढ़ विश्वास बता दे॥ 2377॥
11वैदिक कर्मों को गोविंद राधे।
12वह यदि त्यागे तो उचित बता दे॥ 2378॥
13वैदिक कर्म यदि गोविंद राधे।
14त्यागे भक्त तो है नहिं दोष बता दे॥ 2379॥
15एक भक्त उद्गार गोविंद राधे।
16संध्या को दूर ते वंदन बता दे॥ 2380॥
17हे देव! हे पितर! गोविंद राधे।
18तर्पण को भी वंदन बता दे॥ 2381॥
19हे कर्म, योग, ज्ञान गोविंद राधे।
20सब को नमस्कार दूर ते बता दे॥ 2382॥
21मेरा तो एकमात्र गोविंद राधे।
22राधा कृष्ण चिन्तन काम बता दे॥ 2383॥
23लोक धर्म वेद धर्म गोविंद राधे।
24कुल धर्म तजि मन हरि में लगा दे॥ 2384॥