Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 207
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1कर्म करते हुए गोविंद राधे।
2मन ते मनन हरि कठिन बता दे॥ 2361॥
3जग के कर्मों में गोविंद राधे।
4सबते कठिन कर्म युद्ध है बता दे॥ 2362॥
5कृष्ण ने कहा पार्थ गोविंद राधे।
6मन मुझमें तन युद्ध में लगा दे॥ 2363॥
7गीता का सार यही गोविंद राधे।
8युद्ध कर्म कर मन हरि में लगा दे॥ 2364॥
9मन का ही कर्म कर्म गोविंद राधे।
10तन का किया कर्म कछु फल ना दे॥ 2365॥
11इन्द्रियों ते कर्म करे गोविंद राधे।
12मन ते हो भक्ति कर्मयोग बता दे॥ 2366॥
13रथ की धुरी जैसे गोविंद राधे।
14स्थिर हो तो रथ पहिया चला दे॥ 2367॥
15ऐसे मन हरि में हो गोविंद राधे।
16तन ते हो कर्म कर्मयोग बता दे॥ 2368॥
17हाथ में लगा के तेल गोविंद राधे।
18कटहल काटो हाथ लिप्त ना बता दे॥ 2369॥
19कर्म बाँधे बंधन गोविंद राधे।
20कर्मयोग कर्म-बंधन को छुड़ा दे॥ 2370॥
21अनासक्त धर्म करो गोविंद राधे।
22मन हरि-शरण हो साधन बता दे॥ 2371॥
23कर्ममिश्र भक्ति का गोविंद राधे।
24शास्त्रों में है उपदेश क्यों बता दे॥ 2372॥