Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 204
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1मुख मृदु मुसकनि गोविंद राधे।
2रोम रोम दिव्य आकर्षण बता दे॥ 2325॥
3श्रीकृष्ण ने कहा गोविंद राधे।
4क्या करें स्वागत देवियों बता दे॥ 2326॥
5तत्वज्ञ नर नारी गोविंद राधे।
6मोते करें प्रेम प्रिय ज्यों बता दे॥ 2327॥
7उन तत्वज्ञों के गोविंद राधे।
8कोई भी कामना ना उर में बता दे॥ 2328॥
9स्वजन तन मन धन गोविंद राधे।
10सब मेरे हेतु प्रिय हैं बता दे॥ 2329॥
11याते तुम सब का ही गोविंद राधे।
12आना है उचित वेद सम्मत बता दे॥ 2330॥
13दर्शन तो कर चुकीं गोविंद राधे।
14अब सब लौट जावो घर को बता दे॥ 2331॥
15तुम सब के पति गोविंद राधे।
16यज्ञ में परखते होंगे बता दे॥ 2332॥
17पत्नी के साथ ही गोविंद राधे।
18यज्ञ का कार्य पूर्ण होगा बता दे॥ 2333॥
19यज्ञ-पत्नियों ने कहा गोविंद राधे।
20आप तो अन्तर्यामी बता दे॥ 2334॥
21घर लौट जाने की गोविंद राधे।
22बात है निष्ठुरता की बता दे॥ 2335॥
23वेद कहे जो कोई गोविंद राधे।
24हरि ते मिले, जाय जग ना बता दे॥ 2336॥