Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 195
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1जीव सदाचारी भी गोविंद राधे।
2पूर्व दुष्कर्म फल पावे बता दे॥ 2217॥
3भाव दुराचारी को भी गोविंद राधे।
4संसारी सुख भोग प्राप्त हो बता दे॥ 2218॥
5ऐसे सदाचारी को भी गोविंद राधे।
6नाना दुःख भोग प्राप्त होंगे बता दे॥ 2219॥
7प्रारब्ध फल भोग गोविंद राधे।
8सबको ही भोगना पड़ेगा बता दे॥ 2220॥
9अन्तर इतना है गोविंद राधे।
10भक्त भोगे हँसि मूढ़ रो के बता दे॥ 2221॥
11पर उपकार पुण्य गोविंद राधे।
12पर अपकार तो है पाप बता दे॥ 2222॥
13पुण्य पाप दोनों पाप गोविंद राधे।
14दोनों लख चौरासी द्वार घुमा दे॥ 2223॥
15पाप पुण्य दोनों पाप गोविंद राधे।
16पाप तो नरक पुण्य स्वर्ग पठा दे॥ 2224॥
17स्वर्गवासियों को वेद गोविंद राधे।
18मूढ़ ते भी मूढ़ प्रमूढ़ बता दे॥ 2225॥
19प्राकृत स्वर्ग के तो गोविंद राधे।
20सब देवी देव अनित्य बता दे॥ 2226॥
21माया के तीन गुण गोविंद राधे।
22सत्व, रज, तम तीन नाम बता दे॥ 2227॥
23सर्वश्रेष्ठ सत्व गुण गोविंद राधे।
24शुक्ल वर्ण फल याको स्वर्ग पठा दे॥ 2228॥