Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 193
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1तप युक्त विद्या भी गोविंद राधे।
2मन की समग्र शुद्धि करे ना बता दे॥ 2193॥
3एकमात्र भक्ति ही गोविंद राधे।
4मन की शुद्धि में शक्य बता दे॥ 2194॥
5मम हित जिसका मन गोविंद राधे।
6सात्विक भाव ते युक्त हो बता दे॥ 2195॥
7एकमात्र उसका ही गोविंद राधे।
8अंतःकरण हो शुद्ध बता दे॥ 2196॥
9ऐसा शुद्ध भक्त मम गोविंद राधे।
10जगत को पावन करि दे बता दे॥ 2197॥
11ऐसे ही भक्तों के गोविंद राधे।
12वशीभूत रहता हूँ मैं भी बता दे॥ 2198॥
13कर्म के अनेक भेद गोविंद राधे।
14कर्म विकर्म अकर्म बता दे॥ 2199॥
15कर्ममार्ग में है पूर्व गोविंद राधे।
16वेद का कर्म रूप श्रवण बता दे॥ 2200॥
17वर्णाश्रम धर्म कर्म गोविंद राधे।
18वेदविधियुक्त हो तो स्वर्ग दिला दे॥ 2201॥
19देश काल द्रव्य श्रद्धा गोविंद राधे।
20पात्र उपाय युक्त धर्म बता दे॥ 2202॥
21वैदिक मंत्रों में तो गोविंद राधे।
22एक स्वर त्रुटि वाय नरक दिला दे॥ 2203॥
23मनु को विधिदोष ते ही गोविंद राधे।
24पुत्र नहिं मिला मिली पुत्री बता दे॥ 2204॥