Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 192
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1फलभोग पश्चात् गोविंद राधे।
2केवल दुख ही दुख प्राप्त हो बता दे॥ 2181॥
3कर्म की अन्तिम गति गोविंद राधे।
4घोर अज्ञान अन्धकार बता दे॥ 2182॥
5इन सब कर्मों का गोविंद राधे।
6फल है अति ही तुच्छ बता दे॥ 2183॥
7फलभोग काल में भी गोविंद राधे।
8स्वर्ग लोक शोक ते पूर्ण बता दे॥ 2184॥
9अतएव उपर्युक्त गोविंद राधे।
10मार्ग हैं असत्य अरु त्याज्य बता दे॥ 2185॥
11एकमात्र भक्तियोग गोविंद राधे।
12मार्ग है सर्वश्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2186॥
13मेरा भक्त भुक्ति मुक्ति गोविंद राधे।
14वैकुण्ठ आदि नहिं चाहे बता दे॥ 2187॥
15ऐसे भक्त मोको गोविंद राधे।
16ऊधो प्रिय हैं ऐसे बता दे॥ 2188॥
17जैसे नहिं विधि हर गोविंद राधे।
18राम या रमा या आत्मा बता दे॥ 2189॥
19ऐसे भक्त पाछे मैं गोविंद राधे।
20चलूँ पद रज हित नित्य ही बता दे॥ 2190॥
21भक्ति के अतिरिक्त गोविंद राधे।
22कोई भी मार्ग नहिं श्रेय बता दे॥ 2191॥
23सत्य और दया युक्त गोविंद राधे।
24धर्म भी मन शुद्ध करे ना बता दे॥ 2192॥