Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 191
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1अतः मम वाणी का गोविंद राधे।
2सब ने किया अर्थ भिन्न बता दे॥ 2169॥
3मम वेदवाणी दिव्य गोविंद राधे।
4नाना अर्थ होना स्वभाव बता दे॥ 2170॥
5कछु पाखंडियों ने गोविंद राधे।
6कल्पित मत भी गढ़ दिये बता दे॥ 2171॥
7जो भी थे मायाबद्ध गोविंद राधे।
8निज रुचियुत अर्थ कर दिये बता दे॥ 2172॥
9कछु मीमांसक गोविंद राधे।
10धर्म को ही श्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2173॥
11कछु साहित्यिक गोविंद राधे।
12यश को ही श्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2174॥
13कछु कामशास्त्री गोविंद राधे।
14काम को ही श्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2175॥
15कछु योगवेत्ता गोविंद राधे।
16शम आदि को ही श्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2176॥
17कछु ऐश्वर्य कछु गोविंद राधे।
18त्याग को ही श्रेष्ठ श्रेय बता दे॥ 2177॥
19कछु भोग कछु स्वार्थ गोविंद राधे।
20कछु यज्ञ आदि को श्रेय बता दे॥ 2178॥
21ऊधो किन्तु उपर्युक्त गोविंद राधे।
22सब ही हैं एकमात्र कर्म बता दे॥ 2179॥
23इन सब कर्मों के गोविंद राधे।
24फल हैं आदि अन्त वाले बता दे॥ 2180॥