Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
कर्म · पृष्ठ 190
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1कृष्ण ने कहा ऊधो गोविंद राधे।
2मेरी वेद वाणी है दिव्य बता दे॥ 2157॥
3प्रलय में वेद वाणी गोविंद राधे।
4सृष्टि के साथ लुप्त हुई थी बता दे॥ 2158॥
5पुनः जब मैंने गोविंद राधे।
6सृष्टि की, किया वेद प्रकट बता दे॥ 2159॥
7वेदों में मैंने गोविंद राधे।
8भागवत धर्म श्रेय, ही कहा बता दे॥ 2160॥
9भागवत धर्म ही है गोविंद राधे।
10धारण करने योग्य बता दे॥ 2161॥
11मैंने ही बताया गोविंद राधे।
12ब्रह्मा को वेदों का अर्थ बता दे॥ 2162॥
13ब्रह्मा ने निज सुत गोविंद राधे।
14मनु को कराया वेदज्ञान बता दे॥ 2163॥
15मनु ते भृगु आदि गोविंद राधे।
16सप्तर्षियों को हुआ ज्ञान बता दे॥ 2164॥
17पुनि इन पूर्वजों ते गोविंद राधे।
18मिला ज्ञान सब संतान को बता दे॥ 2165॥
19सब जाति व्यक्तियों के गोविंद राधे।
20भिन्न भिन्न ही थे स्वभाव बता दे॥ 2166॥
21सब के सत्व, रज, तम गोविंद राधे।
22तीन गुण भी थे भिन्न भिन्न बता दे॥ 2167॥
23अतएव उनकी गोविंद राधे।
24चित्तवृत्ति भी थी भिन्न भिन्न बता दे॥ 2168॥