Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 185
Reading 197 of 516 · Source nos. 2124–2135 · Source PDF 202
1दिव्यज्ञान दिव्यप्रेम गोविंद राधे।
2जब गुरु दे तो वाय दीक्षा बता दे॥ 2124॥
3प्रेमप्राप्त गुरु करो गोविंद राधे।
4दम्भी गुरु तो तेरा पतन करा दे॥ 2125॥
5अन्धा कहे अन्धे ते गोविंद राधे।
6आजा अन्धे हौं तोहिँ घर पहुँचा दे॥ 2126॥
7गुरु तो हो अन्धा अरु गोविंद राधे।
8शिष्य हो बधिर दोनों गर्त में गिरा दे॥ 2127॥
9सारा जग अन्धा है गोविंद राधे।
10सब आपु को आँख वाला बता दे॥ 2128॥
11गुरु यदि दंभी हो तो गोविंद राधे।
12गुरु शिष्य साथ जायें नरक बता दे॥ 2129॥
13कंठी तिलक धारे गोविंद राधे।
14हरि उर धारे नहिं दम्भी बता दे॥ 2130॥
15तन पूजा पाठ करे गोविंद राधे।
16मन जगभक्ति करे दम्भी बता दे॥ 2131॥
17कर ते करे नाम जप गोविंद राधे।
18मन करे जग चिन्तन दम्भी बता दे॥ 2132॥
19बात करे रसिकों की गोविंद राधे।
20मन चह विषय-रस दम्भी बता दे॥ 2133॥
21निन्दा सुनि क्रोध करे गोविंद राधे।
22स्तुति सुनि फूला फिरे दम्भी बता दे॥ 2134॥
23औरों की निन्दा करे गोविंद राधे।
24अपनी प्रशंसा करे दंभी बता दे॥ 2135॥