Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 182
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1तीर्थ में जाकर भी गोविंद राधे।
2दोष देखे यह अपराध है बता दे॥ 2088॥
3संतों ने समझाया गोविंद राधे।
4संतों को भी मूढ़ नर मूढ़ बता दे॥ 2089॥
5हरि हरिजन में हो गोविंद राधे।
6नर बुद्धि नाम अपराध करा दे॥ 2090॥
7सिद्ध भक्त को तो कभु गोविंद राधे।
8किसी भी दशा में माया लगे ना बता दे॥ 2091॥
9काम क्रोध आदि कर्म गोविंद राधे।
10हरिजन का योगमाया करा दे॥ 2092॥
11हरि गुरु कर्म दिव्य गोविंद राधे।
12मायिक बुद्धि ते अतीत बता दे॥ 2093॥
13मन बुद्धि मायिक गोविंद राधे।
14हरि गुरु दोनों को मायिक बता दे॥ 2094॥
15चींटी मुख लवण डली गोविंद राधे।
16चढ़े चीनी गिरि गिरि लवण बता दे॥ 2095॥
17पीलिया का रोग दृग गोविंद राधे।
18श्वेत वस्तुओं को भी पीला बता दे॥ 2096॥
19जब जब देखा श्याम गोविंद राधे।
20मन ब्रह्म को भी चौर जार बता दे॥ 2097॥
21गुणातीत हरि गुरु गोविंद राधे।
22त्रिगुण की बुद्धि उन्हें त्रिगुणी बता दे॥ 2098॥
23भक्त वाक्य क्रिया लखि गोविंद राधे।
24बड़े बड़े ज्ञानी भी ज्ञान गमा दे॥ 2099॥