Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 181
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1रस्सी जल जाये किन्तु गोविंद राधे।
2रस्सी का स्वरूप जग देखे बता दे॥ 2076॥
3ऐसे हरि हरिजन गोविंद राधे।
4कर्म जग देखे किन्तु कर्म फल ना दे॥ 2077॥
5कछु संन्यासी करें गोविंद राधे।
6जग का स्वरूपतः त्याग बता दे॥ 2078॥
7कछु संत जग रह गोविंद राधे।
8जग में न हों कभु लिप्त बता दे॥ 2079॥
9पाण्डवों के पाँच पिता गोविंद राधे।
10नारी एक, पाण्डवों को सन्त बता दे॥ 2080॥
11हरिभक्त हो के गोविंद राधे।
12ध्रुव प्रह्लाद आदि राज्य करा दे॥ 2081॥
13नृसिंह प्रह्लाद ते गोविंद राधे।
14एक मन्वन्तर तक राज्य करा दे॥ 2082॥
15हरि हरिजन कर्म गोविंद राधे।
16देखने वालों को बुद्धि विभ्रम करा दे॥ 2083॥
17हरि हरिजन कर्म गोविंद राधे।
18देखने में प्राकृत किन्तु पावन बना दे॥ 2084॥
19हरि हरिजन जित गोविंद राधे।
20रहें या लीला करें तीर्थ बना दे॥ 2085॥
21तीर्थ हैं अगणित गोविंद राधे।
22आगे भी भक्त नये तीर्थ बना दे॥ 2086॥
23तीर्थ यात्रा फल गोविंद राधे।
24श्याम में प्रेम निष्काम हो बता दे॥ 2087॥