Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 178
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1हरि गुरु सेवा अर्थ गोविंद राधे।
2हरि गुरु इच्छा को इच्छा बना दे॥ 2040॥
3हरि गुरु सेवा अर्थ गोविंद राधे।
4हरि गुरु सुख में ही सुखी होे बता दे॥ 2041॥
5हरि गुरु सेवा अर्थ गोविंद राधे।
6गुरु हित निज कोटि प्राण लुटा दे॥ 2042॥
7हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे।
8याते गुरु सेवा हरि सेवा बता दे॥ 2043॥
9हरि गुरु एक ही हैं गोविंद राधे।
10दोनों कोे प्रणाम एक साथ बता दे॥ 2044॥
11हरि के अधीन गुरु गोविंद राधे।
12गुरु के अधीन हरि भेद ना बता दे॥ 2045॥
13स्वार्थ की दृष्टि ते गोविंद राधे।
14गुरु को बड़ा ही कह रसिक बता दे॥ 2046॥
15गुरु प्रेमदान करे गोविंद राधे।
16हरि प्रेम ना दे यह भेद बता दे॥ 2047॥
17हरि की कृपा जो चह गोविंद राधे।
18तन मन धन गुरुसेवा में लगा दे॥ 2048॥
19तन मन धन धन्य गोविंद राधे।
20जो हरि गुरु सेवा में लगा दे॥ 2049॥
21उत्तम शिष्य वह गोविंद राधे।
22जो बिनु आज्ञा करे सेवा बता दे॥ 2050॥
23मध्यम शिष्य वह गोविंद राधे।
24जो माने आज्ञा हर्ष ते बता दे॥ 2051॥