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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

महापुरुष · पृष्ठ 177

Reading 189 of 516 · Source nos. 2028–2039 · Source PDF 194

1प्रथम हरि मिले नाहिं गोविंद राधे।

2हरिजन सेवा हरिसेवा बता दे॥ 2028॥

3गुरु जो भी सेवा ले ले गोविंद राधे।

4गर्व जनि करु आभार जना दे॥ 2029॥

5सारा विश्व दान करो गोविंद राधे।

6तो भी गुरु ऋण ते ना उऋण करा दे॥ 2030॥

7गुरु ने जो दिया ज्ञान गोविंद राधे।

8कोटि प्राण दान भी ना उऋण करा दे॥ 2031॥

9माया ने भुलाया अरु गोविंद राधे।

10गुरु ने जगाया ये भिखारी उन्हें का दे॥ 2032॥

11ऐसे गुरु ऋण ते तो गोविंद राधे।

12कोई उऋण नहिं हुआ है बता दे॥ 2033॥

13ऋणी होने में है लाभ गोविंद राधे।

14बार बार धनी आवे माँगने बता दे॥ 2034॥

15गुरु ने सिखाया देना गोविंद राधे।

16तन, मन, प्राण सब कछु ही बता दे॥ 2035॥

17गुरु ने बताया मोहिं गोविंद राधे।

18उन्हीं का दिया है सब उन्हीं को लुटा दे॥ 2036॥

19गुरु ने पढ़ाया पाठ गोविंद राधे।

20निजसुख हरिसुख को ही बना दे॥ 2037॥

21हरिसुख तेरा सुख गोविंद राधे।

22यह उर ला, और ज्ञान भुला दे॥ 2038॥

23जब लौं मिलें ना हरि गोविंद राधे।

24तब लौं करु गुरुसेवा बता दे॥ 2039॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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