Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 174
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1हरि गुरु निन्दा ऐसा गोविंद राधे।
2नाम अपराध सब साधना नसा दे॥ 1992॥
3हरि हरिजन कर्म गोविंद राधे।
4दिव्य, दीखें मायिक जन ज्यों बता दे॥ 1993॥
5हरि हरिजन कर्म गोविंद राधे।
6दिव्य हरि हरिजन जानें बता दे॥ 1994॥
7रसिकों की भाषा जाने गोविंद राधे।
8रसिक ही या वह जिसको जना दे॥ 1995॥
9हरि गुरु अनुकूल गोविंद राधे।
10सदा सोचना ही तोहिं शरण करा दे॥ 1996॥
11गुरु ने जो ज्ञान दिया गोविंद राधे।
12माया अज्ञान द्वारा ज्ञान भुला दे॥ 1997॥
13गुरु ने जनाया जाना गोविंद राधे।
14माना नाहिं मन कैसे माने बता दे॥ 1998॥
15बुद्धि के अधीन मन गोविंद राधे।
16बुद्धि को अधीन गुरुबुद्धि के करा दे॥ 1999॥
17गुरु में अनन्य हो जा गोविंद राधे।
18अन्य में उदासीन भाव बना दे॥ 2000॥
19गुरु की शरण हो जा गोविंद राधे।
20माया को उर ते विदा करवा दे॥ 2001॥
21गुरु की कृपा बिनु गोविंद राधे।
22कोई ऐसी शक्ति नहिं माया ते बचा दे॥ 2002॥
23गुरु की कृपा है ऐसी गोविंद राधे।
24त्रिगुण त्रिकर्म त्रिताप नसा दे॥ 2003॥