Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
महापुरुष · पृष्ठ 173
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1प्रथम है श्रद्धा पुनि गोविंद राधे।
2सत्संग पुनि भक्ति साधना बता दे॥ 1980॥
3अनर्थ निवृत्ति पुनि गोविंद राधे।
4निष्ठा पुनि रुचि हो सब को बता दे॥ 1981॥
5पुनि हरि आसक्ति गोविंद राधे।
6पुनि हो भाव पुनि प्रेम बता दे॥ 1982॥
7हरि लीला कथा में तो गोविंद राधे।
8रुचि है सबते प्रमुख बता दे॥ 1983॥
9पूर्व संस्कार या गोविंद राधे।
10महत्कृपा ते रुचि पैदा हो बता दे॥ 1984॥
11रुचि ते हो चिन्तन गोविंद राधे।
12हरि चिन्तन वासनायें नसा दे॥ 1985॥
13अत्यधिक पापी की गोविंद राधे।
14हरि लीला कथा में रुचि ना बता दे॥ 1986॥
15श्री गुरु शरण जा गोविंद राधे।
16तर्क वितर्क कुतर्क भगा दे॥ 1987॥
17बुद्धि ने बिगाड़ा सब गोविंद राधे।
18निज बुद्धि को गुरुबुद्धि में जुड़ा दे॥ 1988॥
19गुरु में तो नर बुद्धि गोविंद राधे।
20जनि करु नामापराध करा दे॥ 1989॥
21हरि मिले भक्त मिले गोविंद राधे।
22बार बार किन्तु तू किन्तु लगा दे॥ 1990॥
23हरि गुरु विपरीत गोविंद राधे।
24सोचो जनि नाम अपराध करा दे॥ 1991॥